Saturday, March 8, 2014

धर्म और राजनीति

धर्म का सम्बन्ध व्यक्तिगत विकास से है, चाहे वो कोई भी धर्म क्यों ना हो. धर्म सामाजिक और राजनितिक व्यवस्था के सवालों का हल नही बताता, क्योंकि वो इसके लिये नहीं बना है. कोई भी व्यक्ति अगर धर्म के आधार पर वोट डालता है तो वो राजनितिक नेताओं को धर्म को एक राजनीति करने का हथियार बनाने का मौका देता है. एक बात हमेशा ख्याल रखें कि किसी भी दल के नेता धर्म को लेकर गभींर नही हैं उनके लिये ये सिर्फ वोट पाने का एक तरीका है.

देश में दंगे भी इसीलिये करवाये जाते हैं कि लोग धर्म के लिये थोडे थोडे कट्टर हो जायें और उन्हे धर्म के आधार पर उकसाकर वोट लिये जा सकें. लेकिन दंगे करवाने में बडा हाथ हमेशा ही कट्टर प्रचारकों का होता है. वे ही लोग ऍसी जमीन तैयार करते हैं कि लोगों को लडवाया जा सके और इससे राजनेताओं को सारे जरूरी मुद्दों से छुटकारा मिल जाता है.

जिस तरह के राजनितिक भाषण और बयान आजकल सुनने में आ रहे हैं ये बताते हैं कि हमारे नेता कितने गंभीर हैं पर ये यह भी बताते हैं कि वोटर के रुप में हमने कैसे नेताओ को चुना है. ये हमारी और इन नेताओं, दोनों  की लोकतन्त्र के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाते हैं.

जितना धन इन दिनों राजनितिक गर्मी पैदा करने कि किये खर्च किया जा रहा है, वो निश्चित तौर पर हजारों करोड में है, तो आप समझ लें जो भी कोई इस धन की व्यवस्था इन दलों के लिये कर रहा है, अगली सरकार उनके अच्छे रिटर्न के लिये काम करेगी ना कि आप और हम जैसे लोगों के लिये. राजनितिक व्यवस्था अब असल में आर्थिक लाभ की रणनीतियों से तय होती है. और किसी भी राजनितिक दल के आर्थिक एजेंडे में आप और हम नहीं हैं. कभी थे भी नही.

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