धूमिल जी कि एक कविता -
रोटी और संसद
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
आजादी के 67 साल बाद भी यह प्रश्न शेष है कि हम आज भी एक गरीब देश क्यों कहलाते हैं , क्यों हमारे देश के 45 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं ? आज जब चुनाव सामने खड़े हैं तो हर नेता गरीबी राग क्यों गा रहा है ? क्यों ये गरीब लोग आज भी एक आस में हैं कि किसी दिन इनके घर भी दो जून अनाज होगा ?
इनकी गरीबी राजनीति से तो नहीं मिटने वाली हाँ मगर हमारे राजनेताओं कि तिजोरियाँ भरने का ज़रिया जरूर बनती रहेंगी।
रोटी और संसद
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
आजादी के 67 साल बाद भी यह प्रश्न शेष है कि हम आज भी एक गरीब देश क्यों कहलाते हैं , क्यों हमारे देश के 45 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं ? आज जब चुनाव सामने खड़े हैं तो हर नेता गरीबी राग क्यों गा रहा है ? क्यों ये गरीब लोग आज भी एक आस में हैं कि किसी दिन इनके घर भी दो जून अनाज होगा ?
इनकी गरीबी राजनीति से तो नहीं मिटने वाली हाँ मगर हमारे राजनेताओं कि तिजोरियाँ भरने का ज़रिया जरूर बनती रहेंगी।
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