2013 -14 मे विकास दर की सम्भावना 6 फीसदी रहने की घोषणा की गई थी लेकिन ये 5 फीसदी से भी नीचे है. इस साल कृषि और सर्विस सेक्टर मे विकास दर बेहतर रही परन्तु उत्पादन क्षेत्र मे विकास दर नकारात्मक रही.
अनुसधान और विकास के क्षेत्र मे अमेरिका सबसे अधिक खर्च करता है, चीन दूसरे नंबर पर है, भारत चीन का दसवाँ हिस्सा ही इस मद मे खर्च करता है.
2013 -14 में देश में जो अलग अलग वर्गों मे सब्सिडी दी गई उसमे कार्पोरेट सैक्टर की सब्सिडी सबसे अधिक है, किसानों को वास्तविक रूप मे मिलने वाली सब्सिडी सबसे कम है. यहाँ तक कि पिछले 10 वर्षों मे जितनी सब्सिडी कार्पोरेट सैक्टर को दी गई है वो हमारे कुल बजटीय घाटे से भी अधिक है. किंतु निजी कार्पोरेट सैक्टर, नकारात्मक विकास दर के बावजूद घाटे मे नहीं है, उनके लाभ, साल दर साल बढते ही जा रहे हैं, वो नये नये अधिग्रहण करते जा रहे हैं.
फिर भी आम जनता को किसी सब्सिडी की घोषणा होने पर उधोग जगत, विपक्षी दल, विश्व बैंक आखें तरेरने लगते हैं, क्यों?
हमारे बडे कारोबारी बैंको की कुल NPA लगातार बढती जा रही है, जो कि 2.5 लाख करोङ को पार कर गई है. इसमे देखने की बात ये है कि आखिर कौन वो लोग हैं जो लिया हुआ कर्ज वापिस नही लौटाते. मेरे पास तथ्य तो नही हैं लेकिन मेरे एक जानकार बैंकर ने बताया कि इसमे से 70 फीसदी से भी ज्यादा व्यापारिक कर्ज हैं. जिसमें "मलाया" जैसे किंगफिशर के मालिक भी शामिल हैं.
यानि सब्सिडी भी सबसे ज्यादा उधोगों को ही मिल रही है, सस्ती जमीनें और सस्ते क्ष्रमिक भी उन्ही को चाहिये, नीतियाँ भी उन्हे अपने पक्ष में चाहिये, और कर्ज भी वही दबा कर बैठेंगे. तो आखिर ये राजनितिक दल कर क्या रहे है? ये उधोगपति इस देश का विकास करके देंगे? इनके अपने पेट तो भरते नही, ये दूसरो के पेट भरने की फिक्र कब करने वाले हैं?
पब्लिक सैक्टर मे काम करने वाले सभी लोगो को चाहिये कि वे पूरे मन से अपने काम को पूरा करे. वर्ना सरकारें तो चाहती ही ये है कि सरकार चलाने के अलावा सारा काम निजी कम्पनियों को दे दिया जाये. सारी सरकारी सम्पत्ति औने-पौने दामों में निजी हाथों में बेच दी जाये और फिर उधोगपति और उनसे मिलकर ये नेता, आम जनता का खून जी भर कर चूसें.
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